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बाड़मेर जैसलमेर के रेगिस्तान से लगे घास के मैदानी इलाके, जिसे बन्‍नी कहा जाता है , इन बंन्नियों में बसता विभाजन के समय पलायन करके आया और कुछ उससे पहले के मूल निवासी हिन्द पाक सरहद के सिंधी मुसलमान जो अधिकांश पेशेवर ‘पशुपालक’ है । सिंधी की उपजातियों में राजड़, समेजा, सम्मा, बलोच, मंगलिया, दर्श फ़क़ीर, मेहर,काछेला, नोहडी ,हालयोपात्र इत्यादि हैं। ये सभी सिंधी बोलते हैं । ढाटी, जो सिंधी भाषा का डाइलेक्‍ट है, सम्पूर्ण सरहद के इस पर तक सुनने को मिलती है।

भारत के दूसरे हिस्‍सों मे रहने वाले सिंधीयों के मुकाबले यहाँ सिंधी संस्‍कृति अपने मूल स्‍वरूप में नज़र आती है। आज भी सेड़वा और जैसलमेर जिसे किसी जमाने में अछियो थर कहा जाता था के क्षेत्र में कई जगह अजरक, सिंधी टोपी और उनका पहनावा, संगीत, कहावतें, उनकी भाषा, सब खालिस सिंधी है। वे अब तक उस शाह अब्‍दुल लतीफ के बैत सुनाते हैं, जिसे सिंधी का शेक्‍सपीयर कहा जाता है। उनकी 'औताक' या ओतारौ ( सिंधी घरो के सामने आंगन जैसी जगह जिसे मेल जोल महफिल के लिये इस्‍तेमाल किया जाता है) , में अब भी ससी पुन्‍नू और उमर मारवी की कहानियाँ सुनाई जाती हैं । वे अब भी ‘राणो ’ (एक मशहूर सिंधी राग ) गाते हैं । यहां बसने वाले ज्‍यादातर लोग अनपढ़ हैं या मामूली पढ़े लिखे है हालांकि अब शिक्षा का प्रवाह हो रहा है । इसके बावजूद ये लोग सिंध के महान साहित्‍यकारों के गीत और कविताओं को विशुद्ध रूप में सुनाते है । यहाँ लंगा मांगणियार शाह भिटाई के बैत अपनी गायकी में एक जिंदा समाज की रोजमर्रा की जिन्‍दगी में घुला वो रस है, जिसे हर पीढ़ी अगली पीढ़ी को सौंपती आ रही है ।
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यहाँ से सिंधड़ी अम्मा की सरहद कुछ किलोमीटर की दुरी पर ही है। विभाजन के पहले बढ़ाणो- जैसाणो के दूसरी और पाकिस्‍तान का इलाका जो अमराणो ‘थर’ कहलाता है, में इन लोगो का लगातार आना जाना था। अब भी ये लोग ‘थर’ से रोटी बेटी का ताल्‍लुक बनाये हुये हैं। ये और बात है कि उन्‍हें अब ‘थर’ जाने के लिये वीसा लेकर जाना पड़ता है।

"आऊं कियं सेज सुमां, मुहींजा मारुड़ा पधरे पट सुमन"

बचपन से बहुत सारे सिंधी नज्में, बैत और गीत सुने पर मेरे दिल के सबसे ज्‍यादा करीब है और जो मैं यहां शेयर कर रहा हूं, वो सिंध के ‘उस्‍ताद बुखारी’ का लिखा ‘मुँहिजा मारूअड़ा’ है।

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यह गीत लोक गाथा ‘उमर मारवी’ की प्रेम कहानी पर आधारित है। उमरकोट का राजा उमर एक गरीब लड़की मारवी से ब्‍याह करना चाहता है। वह उसे अपना महल, अपनी सुख सुविधाऐं दिखा कर राजी करना चाहता है, पर मारवी कहती है कि उसके संगी साथी जब गरीबी मे जी रहे हैं, तो वह इन सुख-सुविधाओं के साथ नहीं रह सकती। कहने को यह आशिक माशूक का संवाद है, पर जब आप गीत में भीतर उतरते हैं तो कुछ गहरे मानी जाहिर होते हैं। यह मानवीय करूणा का गीत है, जो इस कुदरत में सिर्फ इंसान अपने जैसे दूसरे इंसानों के लिये महसूस कर सकता है और इस अमानत को एक 5000 साल पुरानी संस्‍कृति ही इस तरह संभाल सकती है। मैंने इस गीत का टूटा-फूटा अनुवाद इस तरह से करने की कोशिश की है -

'कैसे मैं सो जाऊं इस नर्म बिछावन पर
जब सोते हैं संगी साथी मेरे ज़मीन पर 
है ढेर तुम्‍हारी मेज़ पर , व्‍यंजन कई स्‍वादिष्‍ट तर
फिकता है खाना ढेर , जूठे जाम बचते हैं
कई कुत्‍ते और कौवे इसी जूठन पे पलते हैं
मैं कैसे चख लूँ ये ज़ायके ये सारे
मेरे संगी वहाँ रहते है रोज फाके पर 
कैसे मे सो जाऊ इस नर्म बिछावन पर...
बेशक हैं पेड़ सुंदर , नीबू आम तुम्‍हारे बाग मे
कर नहीं सकती मै बातें प्‍यार की इस बाग मे
किस तरह बैठूं मैं इन पेड़ो की ठंडी छांव मे
जोतते है धूप में हल संगी मेरे गांव मे


उमर मारवी की कहानी के अंत में राजा उमर सम्‍मान से मारवी को उसके गाँव छुड़वा देता है। पता नहीं यह लोक कथा कितनी सच है, पर यह निश्चित तौर पर यह उन जीवन मूल्‍यों का पता देती हैं, जिन्‍हें हम सिंधी लोग मानते और सहेजते आए हैं। मानवीय करूणा और भाईचारा , ये वो सूफीयाना जीवनमूल्‍य हैं, जिनके इर्दगिर्द हम सिंधियों ने जीने का ढंग और तरीका बनाया है और इस गीत का जिंदा बचे रहना इस बात की जमानत है।

बुजुर्ग आज भी अपनी औलाद से कहते है कि बन्‍नी जरूर जाइयेगा । जो अनभिज्ञ है "शाह के रीशालो" से उनसे निवेदन है सरहद के इस पार सिंधी भाईयों से मिलियेगा और सिंधी संस्‍कृति और जीवन मूल्‍यों को समझने की कोशिश कीजियेगा। अमिताभ बच्‍चन की तरह कहूँ तो –
‘’ कुछ समय तो गुजारिये , बन्‍नी के सिंधियों के साथ में ...’’ ।

Post Source:  रंग रंगीलो राजस्थान
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